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October 11, 2009

चंद लम्हाते हिज्र का तमाशा देखो

चंद लम्हाते हिज्र का तमाशा देखो
आब-ओ-दाना है यूँ कर उजड़ता देखो
बानगी वस्ल के लम्हों की क्या बतलायें
मिला हो रोते बच्चे को खिलौना देखो
भागती दौड़ती ज़िन्दगी की मसरुफियत में
हुआ है गुम यहीं-कहीं बचपना देखो
वो शख्स इक बूँद की गुजारिश थी जिसे
सागर है मिला फिर भी मचलता देखो
वो 'मारीच' है कभी भी मिल न पाएगा
क्यों बंद आँख से उसे बारहा देखो
ज़ाहिर हो चले राज़ वहशत के सभी
क्यों उस वहशी में तुम रहनुमा देखो
दीवाना है लगे वो कही 'शातिर' तो नहीं
देखो गौर से उसे एं दोस्त ज़रा देखो

October 3, 2009

क्या कहूं, कैसे कहूं, सोचता - दिल डरता है...

वो उड़ती जुल्फ वो काजल वो गुलाबी सी हया
वो सादगी में भी इक नूर सा निखरता है

बरसते भीगते मौसम पे है नशा तारी
के उसके हुस्न के जलवे से कौन उभरता है

अज़ब फ़साना-e-महफिल है होश गुम हैं सभी
ज़रा ही देर वो बेपर्दा जो गुजरता है

वो दोस्त था निगेबाँ था मेरी वफाओं का
दिल आज भी वहीँ अटका वही दम भरता है

जुस्तजू उसकी है 'शातिर' है आरजू-ऐ-विसाल
क्या कहूं कैसे कहूं सोचता दिल डरता है

September 3, 2009

क्यूं रखूं मैं अब अपनी कलम में स्याही ,


क्यूं रखूं मैं अब अपनी कलम में स्याही ,
जब कोई अरमान दिल में मचलता ही नहीं ,
जाने क्यूं सभी शक करते हैं मुझ पर ,
जब कोई सूखा फूल मेरी किताबों में मिलता ही नहीं ,
कशिश तो बहुत थी मेरी मोहब्बत में ,
मगर क्या करूँ कोई पत्थर दिल पिघलता ही नहीं ,
खुदा मिले तो उससे अपना प्यार मांगू ,
पर सुना है वो भी मरने से पहले किसी से मिलता ही नहीं
lavshaily: क्यूं रखूं मैं अब अपनी कलम में स्याही ,
जब कोई अरमान दिल में मचलता ही नहीं ,
जाने क्यूं सभी शक करते हैं मुझ पर ,
जब कोई सूखा फूल मेरी किताबों में मिलता ही नहीं ,
कशिश तो बहुत थी मेरी मोहब्बत में ,
मगर क्या करूँ कोई पत्थर दिल पिघलता ही नहीं ,
खुदा मिले तो उससे अपना प्यार मांगू ,
पर सुना है वो भी मरने से पहले किसी से मिलता ही नहीं

मेरी खामोशियों में भी फसाना ढूंढ लेती है

मेरी खामोशियों में भी फसाना ढूंढ लेती है

बड़ी शातिर है ये दुनिया बहाना ढूंढ लेती है

हकीकत जिद किए बैठी है चकनाचूर करने को

मगर हर आंख फिर सपना सुहाना ढूंढ लेती है

न चिडि़या की कमाई है न कारोबार है कोई

वो केवल हौसले से आबोदाना ढूंढ लेती है

समझ पाई न दुनिया मस्लहत मंसूर की अब तक

जो सूली पर भी हंसना मुस्कुराना ढूंढ लेती है

उठाती है जो खतरा हर कदम पर डूब जाने का

वही कोशिश समन्दर में खजाना ढूंढ लेती

August 29, 2009

क्यूं रखूं मैं अब अपनी कलम में स्याही?

क्यूं रखूं मैं अब अपनी कलम में स्याही ,
जब कोई अरमान दिल में मचलता ही नहीं ,
जाने क्यूं सभी शक करते हैं मुझ पर ,
जब कोई सूखा फूल मेरी किताबों में मिलता ही नहीं ,
कशिश तो बहुत थी मेरी मोहब्बत में ,
मगर क्या करूँ कोई पत्थर दिल पिघलता ही नहीं ,
खुदा मिले तो उससे अपना प्यार मांगू ,
पर सुना है वो भी मरने से पहले किसी से मिलता ही नहीं

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं???

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झूठ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .
जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा .
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .....